Wednesday, February 7, 2018

निशाने पर ‘‘जूठन’

पेरूमल मुरूगन, सोवेन्द्र हांसदा शेखर और अब ओमप्रकाश वाल्मिकी

-सुभाष गाताडे


तुम्हारी महानता मेरे लिए स्याह अंधेरा है..
मैं जानता हूं,/मेरा दर्द तुम्हारे लिए चींटी जैसा/ और तुम्हारा अपना दर्द पहाड़ जैसा
इसलिए, मेरे और तुम्हारे बीच/ एक फासला है/जिसे लम्बाई में नहीं/समय से नापा जाएगा।

ओमप्रकाश वाल्मिीक (जूता)

1997 में आयी वह आत्मकथा ‘‘जूठन’’ आते ही चर्चित हुई थी।

उस वक्त एक सीमित दायरे में ही उसके लेखक ओमप्रकाश वाल्मिकी का नाम जाना जाता था। मगर हिन्दी जगत में किताब का जो रिस्पान्स था, जिस तरह अन्य भाषाओं में उसके अनुवाद होने लगे, उससे यह नाम दूर तक पहुंचने में अधिक वक्त नहीं लगा। यह अकारण नहीं था कि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई के मध्य में वह किताब अंग्रेजी में अनूदित होकर कनाडा तथा अन्य देशों के विश्वविद्यालयों के पाठयक्रम में शामिल की गयी थी। एक मोटे अनुमान के हिसाब से देश के तेरह अलग अलग विश्वविद्यालयों में - जिनमें कई केन्द्रीय विश्वविद्यालय शामिल हैं - इन दिनों यह उपन्यास या उसके अंश पढ़ाए जा रहे हैं।

उपरोक्त आत्मकथा ‘‘जूठनका वह प्रसंग शायद ही कोई भूला होगा, जब इलाके के वर्चस्वशाली जाति से जुड़े किसी सुखदेव के घर हो रही अपनी बेटी की शादी के वक्त अपमानित की गयी उस नन्हे बालक (स्वयं ओमप्रकाशजी) एवं उसकी छोटी बहन माया की मां उस रात गोया दुर्गाबनी थी और उसने त्यागी को ललकारा था और एक शेरनीकी तरह वहां से अपनी सन्तानों के साथ निकल गयी थी। कल्पना ही की जा सकती है कि जिला मुजफ्फरनगर के एक गांव में दृ जो 21 वीं सदी की दूसरी दहाई में भी वर्चस्वशाली जातियों की दबंगई और खाप पंचायतों की मनमानी के लिए कुख्यात है, आज से लगभग साठ साल पहले इस बग़ावत क्या निहितार्थ रहे होंगे। उनकी मां कभी उस शख्स के दरवाजे नहीं गयी।

इस नन्हे बालक के मन पर अपनी अनपढ़ मां की यह बग़ावत  जो वर्णसमाज के मानवद्रोही निज़ाम के तहत सफाई के पेशे में मुब्तिला थी और उस पेशे की वजह से ही लांछन का जीवन जीने के लिए अभिशप्त थी गोया अंकित हो गयी, जिसने उसे एक तरह से तमाम बाधाओं को दूर करने का हौसला दिया।

विडम्बना ही है कि एक ऐसी रचना - जिसने उत्तर भारत में 90 की दशक में उठी दलित उभार की परिघटना में नया आयाम जोड़ा था और शेष समाज के संवेदनशील तबके को झकझोर कर रख दिया था तथा आत्मपरीक्षण के लिए प्रेरित किया था - उससे कुछ लोग ‘‘आहत’’ होते दिख रहे हैं और उन्होंने यह मांग की है कि स्नातक स्तर के पाठयक्रम से उसके अंशों को हटाया जाए। मांग की अगुआई हिमाचल प्रदेश में सत्ताधारी पार्टी से जुड़े छात्रा संगठन कर रहा है।

मालूम हो कि इस उपन्यास के अंग्रेजी अनुवाद के कुछ अंश हिमाचल युनिवर्सिटी के पाठयक्रम में कुछ साल से पढ़ाए जा रहे हैं। पश्चिम के कई देशों में पढ़ाए जा रहे इस उपन्यास से अचानक आहत हो रही भावनाओं’’ का मामला यहां तक पहुंचा है कि पढ़ानेवाले अध्यापक इस सन्दर्भ में दलाई लामा से भी मिल चुके हैं, और छात्रों के एक हिस्से की मांग को लेकर राज्य के उच्च शिक्षा निदेशक ने यह भी कहा है कि मामले की जांच करवाई जाएगीऔर जरूरत पड़ने पर उसे हटा दिया जाएगा। . यह बात विचारणीय है कि पाठयक्रम की कथित विसंगतियों को लेकर दलाई लामा से मिलने की बात  क्या मायने रखती है ? मगर वह किस्सा फिर कभी.



प्रश्न उठता है कि बस्स! बहुत हो चुकाजैसा कविता संग्रह हो या सलामशीर्षक से आया कहानी संग्रह हो या दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्रजैसी रचना हो या सदियों का सन्तापजैसी अन्य पुस्तक हो, साहित्य के इन तमाम रूपों के जरिए एक विशाल तबके के लिए अपमान-जिल्लत भरी जिन्दगी जीने की मजबूरी के खिलाफ अपनी जंग जारी रखनेवाले ओमप्रकाश वाल्मिकी की सबसे चर्चित रचना को अचानक निशाना बनाने की वजह क्या है ? और वह भी उनके इन्तकाल के लगभग पांच साल बाद, जबकि वह अपनी रचना की हिफाजत करने के लिए भी मौजूद नहीं हों।

ऐसी परिस्थिति आज नहीं तो कल विकसित होगी इसकी भविष्यवाणी गोया वाल्मिकी जी ने अपनी रचना में की थी ? अपनी कविता ‘‘उन्हें डर है’’ में उन्होंने साफ लिखा था:

उन्हें डर है
बंजड़ धरती का सीना चीर कर / अन्न उगा देने वाले सांवले खुरदरे हाथ
उतनी ही दक्षता से जुट जायेंगे /वर्जित क्षेत्रा में भी
जहाँ अभी तक लगा था उनके लिए / नो एंटरी का बोर्ड..

....उन्हें डर है
भविष्य के गर्भ से चीख.चीख कर / बाहर आती हजारों साल की वीभत्सता
जिसे रचा था उनके पुरखों ने भविष्य निधि की तरह /कहीं उन्हें ही न ले डूबे किसी अंधेरी खाई में
जहाँ से बाहर आने के तमाम रास्ते / स्वयं ही बंद कर आये थे
सुग्रीव की तरह

विडम्बना ही है देश के प्रबुद्ध जगत में भी इस मसले पर कोई सरगर्मी, कोई प्रतिक्रिया नहीं दिख रही है !

मुमकिन है कि पेरूमल मुरूगन या हांसदा सोवेन्द्र शेखर जैसे लेखकों पर - इलाके के वर्चस्वशाली समूहों के पड़ रहे दबावों को खिलाफ आवाज़ उठानेवाले प्रबुद्ध जनों तक यह ख़बर पहुंची नहीं है या उसकी गंभीरता से वाकीफ नहीं हो सके हैं।

2

जूठनको पाठयक्रम से बाहर कर दिए जाने की इस मांग को कैसे समझा जाए, यह मसला विचारणीय है।
क्या यह कहा जाना मुनासिब है कि समाज एवं साहित्यजगत पर हावी ऐसे लोग अभीभी उस सच्चाई से रूबरू नहीं होना चाहते कि भारत में जातिप्रथा सदियों से उपस्थित रही है, जिसने शुद्धता और छूआछूत के नाम पर समाज के बड़े हिस्से को बुनियादी मानव अधिकारों से भी वंचित रखा है और आधुनिकता के आगमन के बाद ही इस संरचना में पहली बार कुछ हरकत, बदलाव की गुंजाइश दिख रही है ?

अपनी चर्चित रचना ‘‘अछूत कौन और कैसे ?’’ जिसमें वह अस्प्रश्यता के जड़ तक पहुंचने की कोशिश करते हैं, डा अम्बेडकर ने इसी दोहरे रूख की पड़ताल की थी। 

सनातन धर्मान्ध हिंदू के लिए यह बुद्धि से बाहर की बात है कि छुआछूत में कोई दोष है। उसके लिए यह सामान्य स्वाभाविक    बात है। वह इसके लिए किसी प्रकार के पश्चात्ताप और स्पष्टीकरण की मांग नहीं करता। आधुनिक हिंदू छुआछूत को कलंक तो समझता है लेकिन सबके सामने चर्चा करने से उसे लज्जा आती है। शायद इससे कि हिंदू सभ्यता विदेशियों के सामने बदनाम हो जाएगी कि इसमें दोषपूर्ण एवं कलंकित प्रणाली या संहिता है जिसकी साक्षी छूआछूत है।

- डा अम्बेडकरअछूत कौन और कैसे ?

विडम्बना ही है कि जाति प्रथा के महज उल्लेख से - उसके वर्णन से - भावनाएं आहत होने के मामले में हिमाचल प्रदेश के भद्रजन अकेले नहीं कहे जा सकते।

अभी कुछ समय पहले उधर मलेशिया में भारतीय मूल के निवासियों की गिरफ्तारी का मसला अचानक सूर्खियां बना था। बताया गया था कि हिन्ड्राफ’ (Hindraf)    नामक संगठन के कार्यकर्ता इस बात से नाराज थे कि मलेशिया के स्कूलों में बच्चों के अध्ययन के लिए जो उपन्यास लगाया गया था, वह कथित तौर पर भारत की छवि खराबकरता है। आखिर उपरोक्त उपन्यास में ऐसी क्या बात लिखी गयी थी, जिससे वहां स्थित भारतवंशी मूल के लोग अपनी मातृभूमिकी बदनामी के बारे में चिन्तित हो उठे थेे। अगर हम बारीकी से देखें तो इस उपन्यास में एक ऐसे शख्स की कहानी थी जो तमिलनाडु से मलेशिया में किस्मत आजमाने आया है और वह यह देख कर हैरान होता है कि अपनी मातृभूमि पर उसका जिन जातीय अत्याचारों से साबिका पड़ता था, उसका नामोनिशान यहां नहीं है।

यह सवाल किसी ने नहीं उठाया कि अपने यहां जिसे परम्परा के नाम पर महिमामण्डित करने में हम संकोच नहीं करते हैं, उच्चनीचअनुक्रम पर टिकी इस प्रणाली को मिली दैवी स्वीकृति की बात करते हैं, आज भी आबादी के बड़े हिस्से के साथ (जानकारों के मुताबिक) 164 अलग अलग ढंग से छूआछूत बरतते हैं, वही बात अगर सरहद पार की किताब में उपन्यास में ही लिखी गयी तो वह उन्हें अपमान क्यों मालूम पड़ती है।

और मलेशिया में बसे आप्रवासी भारतीय अनोखे नहीं है।

अमेरिका की सिलिकान वैली -सैनफ्रान्सिस्को बे एरिया के दक्षिणी हिस्से में स्थित इस इलाके में दुनिया के सर्वाधिक बड़े टेक्नोलोजी कार्पोरेशन्स के दफ्तर हैं - में तो कई भारतवंशियों ने अपनी मेधा से काफी नाम कमाया है। मगर जब कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में पाठयक्रमों की पुनर्रचना होने लगी, तब हिन्दु धर्म के बारे में एक ऐसी आदर्शीकृत छवि किताबों में पेश की गयी, जिसका हकीकत से कोई वास्ता नहीं था। अगर इन किताबों को पढ़ कर कोई भारत आता तो उसके लिए न जाति अत्याचार कोई मायने रखता था, न स्त्रिायों के साथ दोयम व्यवहार कोई मायने रखता था। जाहिर है हिन्दु धर्म की ऐसी आदर्शीकृत छवि पेश करने में रूढिवादी किस्म की मानसिकता के लोगों का हाथ था, जिन्हें इसके वर्णनमात्रा से भारत की बदनामी होने का डर सता रहा था। साफ था इनमें से अधिकतर उंची कही जानेवाली जातियों में जनमे थे। अन्ततः वहां सक्रिय सेक्युलर हिन्दोस्तानियों को, अम्बेडकरवादी समूहों तथा अन्यमानवाधिकार समूहों के साथ मिल कर संघर्ष करना पड़ा और तभी पाठयक्रमों में उचितपरिवर्तन मुमकिन हो सका. यह दलील दी जा रही थी कि हिन्दुओं में जाति एवं पुरूषसत्ता का चित्राण किया जाएगा तो वह हिन्दु बच्चों को हीन भावनासे ग्रसित कर देगा और उनकी प्रताडनाका सबब बनेगा, लिहाजा उस उल्लेख को टाला जाए। उपरी तौर पर आकर्षक लगनेवाली यह दलील दरअसल सच्चाई पर परदा डालने जैसी है क्योंकि वही तर्क फिर नस्लवाद के सन्दर्भ में भी इस्तेमाल किया जा सकता है और किताबों से उसकी चर्चा को गायब किया जा सकता है।

अम्बेडकर के विचारों से प्रेरित ओमप्रकाश वाल्मिकी के लेखन को इस तरह विवादित बना देने को लेकर - जो एक तरह से समूचे ‘‘दलित लेखन’’ के प्रति वर्णवादी मानसिकता की नकारात्मक प्रतिक्रिया का सटीक उदाहरण है - एक क्षेपक के तौर पर हम अमेरिका में ब्लैक लिटरेचर अर्थात अश्वेत साहित्य के प्रति श्वेत प्रतिक्रिया की भी पड़ताल कर सकते हैं:

वैसे दलित लेखन को लेकर कथित वर्चस्वशाली जातियों की प्रतिक्रिया बरबस अश्वेत लेखन को लेकर श्वेत प्रतिक्रिया की याद ताज़ा करती है:

किसे गुणवत्तापूर्ण /श्वेत/साहित्य कहा जाए इसे लेकर उच्चनीचअनुक्रम/हाईरार्की की दुराग्रही अवधारणा और फिर उसी साहित्य में किन /श्वेत/ पात्रों को मानवीय समझा जाए और उनकी जिन्दगियों की नकारात्मक घटनाओं को लेकर एक विमर्श बना है। यह कोई बौद्धिक या आकलन का मुददा नहीं है ..; यह नस्लीय मुददा है ...

...महान अश्वेत लेखक जेम्स बाल्डविन ने लिखा है कि किस तरह श्वेतजन अपने खुद के अस्तित्व को लेकर उन भ्रांतियों -भ्रमों / जिन्हें श्वेत वर्चस्व ने गढ़ा है/ से रूबरू होने से इन्कार करते हैं, जिनको वह निर्मित करते हैं तथा उसी पर जिन्दगी गुजार देते है ; किस तरह उन छदमों से परे अपने अस्तित्व की पड़ताल करना भी उनके लिए कठिन होता है ...
(http://www.gradientlair.com/post/44561535092/white-responses-to-black-literature)


3.

आखिर जब किताब कुछ साल से पढ़ायी जा रही थी तब भावनाओं के अचानक आहत होने की बात कहां से पैदा हुई।क्या इसका ताल्लुक राज्य में हुए हालिया सत्ता परिवर्तन से जोड़ा जा सकता है।
साफ है कि जिस किस्म का सियासी समाजी माहौल बन रहा है, जहां मनु और उसके विचारों की हिमायत करने पर इन दिनों किसी को एतराज होना तो दूर, आप सम्मानित भी हो सकते हैं, उस प्रष्ठभूमि में डा अम्बेडकर के विचारों के रैडिकल अन्तर्य/अन्तर्वस्तु को लोगों तक पहुंचाती दिखती किताब - भले ही वह आत्मकथा हो - उस पर इन यथास्थितिवादियों की टेढ़ी निगाह जाना आश्चर्यजनक नहीं लगता।

फिलवक्त़ केन्द्र में तथा देश के कई राज्यों में सत्तासीन इस जमात के लोगों का चिन्तन तरह समूचे मुल्क को रूढिवाद और परम्परा के गर्त में ढकेल देना चाहता है, इसकी एक मिसाल दी जा सकती है।  दिसम्बर माह की 10 तारीख को जयपुर में बाकायदा एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसका शीर्षक था ‘‘मनु प्रतिष्ठा समारोह’’ जिसमें संघ परिवार के अग्रणियों ने साझेदारी की थी। इसमें यह बात जोर देकर कही गयी थी मनु की छवि को इतिहासकारों ने विक्रत किया है। याद रहे कि जयपुर ही वह शहर है जहां मनु की मूर्ति की स्थापना भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्राी भैरोंसिंह शेखावत के जमाने में उच्च अदालत में की गयी थी। यह किसी की चिन्ता का विषय उन दिनों नहीं बना था कि डा अम्बेडकर की मूर्ति अदालत के कहीं कोने में पड़ी है।

भले ही यह बात अब इतिहास की किताबों में दर्ज हो, मगर हमें नहीं भूलना चाहिए कि पचास-साठ के दशकों में उत्तर भारत में चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु, ललई सिंह यादव ‘‘पेरियार’’, रामस्वरूप वर्मा आदि कइयों ने अपने लेखन से जो अलख जगाए रखी, अपने सामाजिक सांस्क्रतिक प्रबोधन से उत्पीड़ित समुदाय को मुक्ति के फलसफे से अवगत कराया, भाग्यवाद के घटिया चिन्तन से तौबा करना सीखाया, उसी मुहिम ने तो बाद में दलित-उत्पीड़ित एसर्शन/दावेदारी की जमीन तैयार की।

पचास - साठ के दशकों से हालात काफी बदले हैं, मगर इसके बावजूद ऐसे विचारों की ताप समाप्त नहीं हुई है। वह नए नए नौजवानों को आमूलचूल बदलाव के फलसफे से रूबरू करा रही है।

ऐसे उथलपुथल भरे माहौल में  ओमप्रकाश वाल्मिकी की भारतीय समाज की तीखी आलोचना निहित स्वार्थी तत्वों को कैसे बरदाश्त हो सकती है, जो न केवल यथास्थिति बनाए रखना चाहते हैं बल्कि वर्णव्यवस्था से सदियों से उत्पीड़ित तबकों को धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ खड़ा करके एक नए किस्म की पेशवाई को - ब्राहमणवादी हुकूमत को - कायम करना चाहते हैं।

इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि वर्ष 2014 में जब से मोदी की अगुआई में सरकार बनी है तबसे दलितों के उभार की कई घटनाएं सामने आयी हैं और दिलचस्प यह है कि हर आनेवाली घटना अधिक जनसमर्थन जुटा सकी है। दरअसल यह एहसास धीरे धीरे गहरा गया है कि मौजूदा हुकूमत न केवल सकारात्मक कार्रवाई वाले कार्यक्रमों /आरक्षण तथा अन्य तरीकों से उत्पीड़ितों को विशेष अवसर प्रदान करना/ पर आघात करना चाहती है बल्कि उसकी आर्थिक नीतियांें - तथा उसके सामाजिक आर्थिक एजेण्डा के खतरनाक संश्रय ने दलितों एवं अन्य हाशियाक्रत समूहों/तबकों की विशाल आबादी पर कहर बरपा किया है।

यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि हुकूमत में बैठे लोगों के लिए एक ऐसी दलित सियासत की दरकार है, जो उनके इशारों पर चले। वह भले ही अपने आप को डा अंबेडकर का सच्चा वारिस साबित करने की कवायद करते फिरें, लेकिन सच्चाई यही है कि उन्हें असली अंबेडकर नहीं बल्कि उनके साफसुथराक्रत /sanitised  / संस्करण की आवश्यकता है। वह वास्तविक अंबेडकर से तथा उनके रैडिकल विचारों से किस कदर डरते हैं यह गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्राी आनंदीबेन पटेल के दिनों के उस निर्णय से समझा जा सकता है जिसने किसी विद्वान से सम्पर्क करके लिखवाये अंबेडकर चरित्रा की चार लाख प्रतियां कबाड़ में डाल दीं, वजह थी कि उस विद्वान ने किताब के अन्तमें उन 22 प्रतिज्ञाओं को भी शामिल किया जो डाअंबेडकर ने 1956 में धर्मांतरण के वक्त़ अपनेअनुयायियों के साथ ली थीं।

और शायद इसी एहसास ने जबरदस्त प्रतिक्रिया को जन्म दिया है। और अब यही संकेत मिल रहे हैं कि यह कारवां रूकनेवाला नहीं है।

चाहे चेन्नई आई आई टी में अंबेडकरपेरियार स्टडी सर्कल पर पाबंदी के खिलाफ चली कामयाब मुहिम हो या हैद्राबाद सेन्टल युनिवर्सिटी के मेधावी छात्रा एवं अंबेडकर स्टुडेंट एसोसिएशन के कार्यकर्ता रोहित वेमुल्ला की सांस्थानिक हत्याके खिलाफ देश भर में उठा छात्रा युवाआन्दोलन हो   या महाराष्ट में सत्तासीन भाजपा सरकार द्वारा अंबेडकर भवन को गिराये जाने के खिलाफ हुए जबरदस्त प्रदर्शन हों या इन्कलाबी वाम के संगठनों की पहल पर पंजाब में दलितों द्वारा हाथ में ली गयी जमीन प्राप्ति आन्दोलनहो - जहां जगह जगह दलित अपने जमीन के छोटे छोटे टुकड़ों को लेकर सामूहिक खेती के प्रयोग भी करते दिखे हैं, या उना के बहाने चली जबरदस्त हलचल हो जब यह नारा उठा था कि ‘‘गाय की पूंछ तुम रखो, हमें हमारी जमीन दो।

भीमा कोरेगांव ‘‘शौर्य स्म्रति दिवस’’ के हुए विराट आयोजन और उसमें आम जनसाधारण की व्यापक सहभागिता, जिसमें आज के ‘‘पेशवाओं’’ को शिकस्त देने की उठी आवाज़ तथा उसकी प्रतिक्रिया में रूढिवादी ताकतों का संगठित हिंसाचार, हिन्दुत्ववादी संगठनों की बदहवासी भरी हरकतें इसी बात की ताज़ी मिसाल है।

इस समूची प्रष्ठभूमि में यह अकारण नहीं कि ओमप्रकाश वाल्मिकी की रचना को ‘‘आहत भावनाओं’’ की दुहाई देते हुए वह दफना देना चाहते हैं, नफरत पर टिके अपने निज़ाम के लिए कुछ और पलों की गारंटी करना चाहते हैं।

The Crisis of Liberal Order in India and Successes of Hindutva Fascism



Sanjay Kumar

The last three and a half years of Modi government have made many Indians acutely aware of the threat Hindutva poses to whatever little democracy exists in the country. Minorities and Dalits have been physically assaulted by supporters of Hindutva with full state patronage. The bureaucracy and criminal justice system, which were already autocratic and corrupt, have been systematically infiltrated to communalise them further. Critics of Hindutva like Gauri Lankesh have been murdered in broad day light.Social media, which has emerged an important medium for country’s urban youth to form and express opinion, is dominated by troll armies of Hindutva that spread hatred and openly threaten people challenging Hindutva, or Modi government. Large sections of traditional media have become mouth pieces of the regime and brazenly pander to Hindu communal sentiments. The leader reigns supreme. The chaterrati in the media even applaud his mindless actions like demonetization. Opponents of the regime are openly branded anti-national, and brazen lies are spread about them. All sensible people of the country realise that the hatred, public violence, and communalization of state institutionsby Hindutva organisations are taking country towards disaster, and if it is to be saved Hindutva needs to bedefeated politically. The disaster India faces is that of a successful fascism. In times like these politically aware groups also have an additional responsibility.Hindutva does need to be defeated. However, this does not mean that the extant liberal mode of governance threatened by it be accepted uncritically.To the extent that the Hindutva is not a conspiracy, and roots of its success lie within Indian society and politics, it is also necessary to critically examine accepted notions of Indian democracy and society.

At this critical time in the life of liberal democracy in India,the dominant non-Hindutva forces, anti BJP political parties, liberal intelligentsia etc.appear to be curiously silent aboutthe social basis ofHindutva’s success. This silence is not surprising.  Success of Hindutva has comelargely throughmeans considered legitimate under liberal mode of governance. Even its criminalities have been tolerated by successive non-BJP governments in the past.Notice two facts in this regard: a) The movement to destroyBabri mosque in Ayodhyawas the largest popular mass mobilisation in the post independence India, andb) everywhere, governments of the Hindutva party have come to power through elections, via popular mandates. Liberal democracy in India is facing a crisis not just because the anti-liberal, anti-democratic party of Hindutva is in power, but because the liberal order itself is in crisis. This crisis of the liberal order is little appreciated, or even understood.

This presentation touches three themes. First we register the popular character of fascism, which distinguishes it from other forms of authoritarian rules. Second we look at some of the blind spots of the practice of democracy in India, which over time have created space for Hindutva, and should help us understand why significant number of Indians after nearly seven decades of formal liberal democracy are giving their allegiance to a fascist project. Finally, we will look at the relationship between caste and Hindutva. Hindutva is not a project to reestablish hierarchical Brahmanical social order, yet at the current moment it is most suitable for Savarna castes to maintain their social and ideological hegemony. However, it acquired a mass character only after it was able to draw in Shudra and Dalit castes under its fold. The neo liberal order ushered in the past three decades has provided political economic support structures to Hindutva. This much more dynamic form of capitalism in India has increased domination of corporate capital, weakened state welfare institutions and altered the balance of class forces, and also altered characteristics of certain classes. However, this very important basis of the success of Hindutva will not be discussed here.

I

Fascism as Popular Authoritarianism: Fascism is an authoritarian political project.Its politicsis closely united with very specific social, cultural and moral agendas, much more than the other ‘normal’ politics under capitalism. It is authoritarian because power and domination are its primary themes in all spheres. Socially powerful get drawn to it because it valorizes domination and is ready to use violence against those who challenge existing structures of power. However, even though it is supportive of existing power structures, like state bureaucracy, caste, patriarchy etc. it is not conservative. In fact it presents itself as a radical alternative which will bring a better ordered society, a stronger nation, and economic development (all of which are present in the BJP propaganda under Modi). Its authoritarianism is a direct threat to core democratic requirements of freedom and equality. What distinguishes it from other authoritarian rules such as military dictatorships is that it consciously attempts to draw popular legitimacy.This important character of fascism, which is the source of its strength,is little noted by its critics.

Liberal ideology understands Fascism as the direct and complete opposite of itself. It claims to stand for freedom; fascism is seen as totalitarian, controlling all aspects of social life under a violent dictatorship. Reality is far more complex. Liberal democracy, as for instance enshrined in Indian constitution, and fascism should be seen as ideal extremes of capitalist state power that attempts to be hegemonic and relies on popular legitimacy.In reality, any hegemonic power relies on both consent and coercion, and hence, any capitalist state power relying on popular legitimacy will have elements of both democracy and authoritarianism.

Liberal democracy starts with the assumption of rights bearing equal citizens who come together to govern themselves. In this ideal form it is an inclusive project. Fascism in contrast is an authoritarian project that relies upon public violence against selected minorities, or war to create and sustain a political community. Nationalism, race, religion, civilization, etc are some of the grids which fascism uses to cement this political community. The fact that fascism uses violence and extreme forms of coercion against selected minorities and its political opponents does not mean that it does not enjoy, or does not care for, and does not try to create, popular legitimacy for itself.

We see it clearly how Hindutva is cleverly creating a majoritarian politics, which calls upon 'the people of India' (actuallyHindus of India who form 84% of Indians) to target their selected enemies: minorities, leftists, anti-national liberals, etc.  What Nehru had warned against, a majority communalism masquerading as nationalism, has grown right before our eyes. This is no longer a conspiracy, or a plan of RSS headquarters in Nagpur, but an embodied reality inpopular attitudes, modes of behaviour and values. We can compare and contrast the situation with the 1975-77 Emergency when Congress under Indira Gandhi became the symbol of anti people authoritarianism. Then, the idea that if given a chance, people will throw out the authoritarian leader seemed reasonable; and that is how indeed it turned out in 1977 elections. Now, the nature and modus operandi of Hindutva authoritarianism are different. How do you challenge a 'popular' authoritarianism, whose kit bag also contains legitimate 'democratic' tools. In any democratic project, it is ultimately the people themselves who assert their democratic rights and make society and state democratic. How do we address the people who are supporting anti-democratic politics?Old assumptions and methods will not work.

II

Blind Spots of Liberal Democracy in India

People like Dr.Ambedkar were deeply aware that in an unequal and divided society democracy will not be a spontaneous development. It was not that once a liberal democratic constitution is in place, the state and society will merrily start chugging along the path of democracy. Rather than paying attention to Ambedkar’s premonitions, Indian political parties and people have generally adopted apopulist notion of democracy.

1. Democracy as Majority Rule: The populist understanding of democracy easily slips in to an equation of democracy with majority rule. Liberals at best demand adequate protection of minority interests. This ab initio justification of majority rule is completely blind to the very reason which justifies majority having more value than minorities.  Majorities and minorities in a democratic order are created by simple accretion of uniform and equal units, as for example in the formula: one person one vote. The political valueof majority arises from supposedly inherent and equal value of these units. It follows that the majority carries value only as long the condition which gives it value in the first place is observed.Majoritarian politics undercuts this very condition byattackingthe political value of minorities, as for example is happening with Muslims and Dalits in India. Hence, the majority created by Hindutva is anti-democratic. Liberals who argue for special protection of minorities, miss the point that majoritarian politics is actually against the democratic interests of every one, including members of the supposed majority.Democracy is preferable not because it allows people forming majority to rule, but because it creates condition in which everyone is equally free and carries equal value. This argument is missing from political discourses in India, including radical ones. It is not difficult to see that this failure has contributed greatly to the popular success of Hindutva argument that since Hindus form the overwhelming majority of Indians, India should first of all be a country for Hindus.

2. The other blind spot in the practice of democracy in our country is community based electoral politics. There is no doubt that the past nearly seventy years of electoral democracy have expanded and deepened the stake people feel in elected governments. Over time, many oppressed and deprived sections of the society, which could not vote in earlier elections, have been mobilised, and in India we actually witness an interesting phenomenon that larger percentages of deprived and oppressed people vote than the privileged and the rich. Another important fact is that this mobilisation has occurred at the level of community, mainly caste. It has been generally believed that participation of oppressed castes has broadened and deepened democracy in India. While this is true, another parallel process has been overlooked. All communities which become active during elections are actually 'created' communities, called into action by leaders, parties and their ground level workers. If communities like these become the main mode of address to an average voter, then it is only a matter of time that an organisation gets successful in mobilising the largest such 'community' , the Hindu religious community. This follows from the logic of the 'arithmetic' of electoral politics in our country. For some time many of us had thought that the pluralities of caste, language, and regional variations in India will not allow mobilisation of people around a monolithic Hindutva identity to be successful. Actually, it seems that in states like Asom and UP, Hindutva has gone around this problem. In UP it managed to mobolise non Jatavdalits and non Yadav OBCs by specifically targeting them against BSP and SP. In the process it managaed to disempower Muslim voters, who constitute nearly 18% of all voters. In Asom it managed to disempower nearly 30% of Muslim voters. Actually this exercise of dis empowering a significant minority is not unique to India. In the US, in the past four decades, the Republican Party has evolved a programme which systematically disregards interests to 12 percent African Americans. And, in all presidential elections the majority of white voters have always voted for republican candidates. This was the case even during 'landslide' Obama victories.

3. Among the blind spots of Indian democracy we must also touch upon its hugely compromising notion and practice of secularism. The unique brand of secularism in India has been called  'sarvdharmsambhav', which literally translates as equal attitude towards all religions. Opportunistic politicians have translated it to 'equal respect for all religions'. An idea like the latter is completely against the spirit of secularism. Secularism in a democracy has two assumptions. The first assumption is that the fundamental democratic values, those of equality and fundamental rights, are not based upon any religious belief. In this sense the basic democratic values are secular. The second principle, that a secular state will not prefer any religion over others is a requirement of the principle of equality. A consequence of the secular basis of democracy is that any religious practice which violates these principles, for instance the principle of equality, can be outlawed. Indian state did outlaw untouchability, even though for many Hindus it was an article of faith. So a secular democratic state power can not follow a formula like equal respect, or equal attitude towards all religions. Yet it does not mean that secularism is anti religion. It does not interfere in the sphere of personal beliefs, nor does it deny believers the right to associate on the basis of their religion. Rather, it is the only basis on which believers of all religions can enjoy equal freedom to practice their religion.

III
Caste and Hindutva Fascism

As is well known Hindutva is a project to develop a political community of Hindus. Hindu society has been, and to a significant extent remains, a caste society. Liberal democracy in India has failed to save Indiansfrom the scourge of caste. This would not have surprised Ambedkar. He was clear that radical social change was not in the interests of the savarna leadership of the Congress of his time, that freedom movement, and post Independent Indian state would prove to be convenient tools for savarna castes to maintain their social hegemony, and that even if universal adult franchise could usher in a government of the people, as long as caste exists in the public life of Hindus, it would not be a government by the people, and for the people.

At the current moment Hindutva is proving to be the most successful means for savarna castes to maintain their ideological and political hegemony. However, the re-establishment of old Brahmanical ritual based caste hierarchy is not its aim.  It does not mind an OBC Prime Minister, a President belonging to a Dalit caste, and can not publicly support untouchability. Hindutva is also comfortable with the politics of oppressed castes in electoral politics. In fact the inherent divisiveness of caste in politics makes it imminently suitable for social engineering under a hegemonic project. The relationship of Hindutva and caste is actually complex, involving both mutually supportive, as well as antagonistic elements.

Hindutva and caste are different but they share common characteristics and derive strength from common social practices.Some of these common characteristics and practices are :

(a) Imperviousness to the calls of universal humanism, without which modern democracy is impossible.

(b) Caste and Hindutva both consciously articulate themselves as above, or alien to the law. Hindutva does it openly by its claim that the existing liberal secular order of law is against Hindu interests. For castes, it is the understanding that asself governed entitiesthey need not follow external rules. Khap panchayats are a clear illustration.

(c)The third overlap between caste and Hindutva is religion. Both operate with a sense of obvious naturalness to their demands. To the extent that the idea of self and community for an average Hindu is still largely religious, it helps both caste and Hindutva become effective in everyday life.

Such overlaps however do not mean that caste can be readily incorporated in the political programme of Hindutva. Caste ridden Hindu society is not easily amenable to community wide calls of political nature. Congress achieved it under a basically liberal project that had place for at least a formal critique of caste as part of the reform of Hindu society. Hindutva can not take any anti caste stance due to the centrality of the idea of a Great Hindu civilization/religion in its programme. This explains why for many decades after its initiation it remained confined to savarna castes.

The two key events in the growth trajectory of Hindutva were one, when it became the common political sense of savarna castes, and second when it managed to draw in sizeable sections of Shudra and untouchable castes.

The first was achieved when the Congress formula of broad coalitions of social groupings unraveled in the absence charismatic leadership, and savarna castes found that it is unable to counter rural dominant castes. Savarna castes now form the core voter base of Hindutva.

The success with Shudras and untouchables is the real tour de force of Hindutva, which helped it become a mass movement. This was facilitated by the preponderance of religion in the cultural and community life of Hindus. Hindutva exploited this religiosity through two complementary tactics. RSS affiliated organisations facilitated, encouraged and organized events of mass religiosity. The Hindutva touch was given by a certain kind of aggressive occupation of public space with a clear lumpen character. These organisations also calibrated their programmes by incorporating specific caste centric gods, temples and religious programmes within a Sanskritising narrative. The success of this strategy was based on the continuing hegemony of Brahminical cultural norms at the molecular level, where the penetration of suitable counter narratives, either anti caste Periyarite or Ambedkarite, or the mores of modernisation, was weak. It succeeded most dramatically in the ‘cow belt’ heartland of Northern India.

As mentioned earlier, the re-establishment of old Brahminical ritual based caste hierarchy is not an aim of Hindutva.  However, it is dead against any anti-caste movement, because that can challenge existing power relations in society, as BhimSena is trying to do in Saharanpur. It can incorporate non-Jatavdalit castes in UP, and can hope to manage a Hardik Patel. It can not stand a RohithVemula whose anti-caste stand was inspired by a deep and universal conception of human equality, and a JigneshMevani who has deftly combined his anti-caste politics with concrete socio-economic demands.Their politics is not only anti-Hindutva, but has the potential to knock the bottom out of Hindu caste order. Hindutva provides a safe haven for all hierarchical caste prejudices, of savarnas against OBCs and Dalits, and of OBCs against Dalits. A radical Dalit who has courage to stand against all, is its public enemy number one. More than ever before, it is the time to challenge the Hindu caste order in India.

Summing Up

A successful counter to fascism has to target sources of its popular base. This requires bringing into open its contradictions with other interests of the people. The argument that Hindutva is bad because it threatens minorities will not do. We have to prove to the members of the so called majority that it is against them too.

Many Marxists claiming to follow a class motivated understanding of society fail to notice relative autonomy of the state and politics under it, and see fascism simply as an instrument of the rule of the capital. They claim it to be just another variant of class dictatorship, thereby failing to register specifics that distinguish it from other forms of politics and state under capital. They even fail to appreciate that under suitable circumstances bourgeois state can actively follow policies aiming popular legitimacy. Economic exploitation under capitalism occurs within laws of commodity exchange. Hence, once conditions for the commodity exchange, including ‘free’ labour, are in place, capitalist exploitation does not require direct political coercion. This creates the space for relative autonomy of politics and state, which means that far from being a mere instrument of capital these develop their own dynamic. Elections and electoral politics under universal franchise have emerged as the main means for popular legitimacy of bourgeois states. Even socially and economically backward countries like Nepal, or India have opted for elected governments. Indian state has close to three million elected representatives from village panchayats to the national parliament. This is number larger than ever for any country in the human history.

Hindutva project is working on many domains simultaneously. Besides open violence against minorities and Dalits, it also involves extreme centralization and communalization of state institutions, and systematic interventions in popular ideology. It needs to be countered in all domains. Given Indian social and political realities, one strategy, one programme of action, or one set of alliances will not work in all domains. For instance, almost no mainstream political party is likely to come out openly against Hindu communalization of public sphere. However, they may be in conflict with the Hindutva party politically, and against its specific policies.Anglicised liberal sections of Indian elites do show opposition to the chauvinistic agendas of Hindutva in popular ideology. However, given their class position they are not likely to oppose economic policies of the Modi government. Such considerations help untangle complex questions which often do not have simple either-or answers.

One such complex question is directly political, related to support to non-BJP parties during elections. For many decades Congress has played opportunistic communal card. It presided over the destruction of Babri Mosque. Before the last elections, SP in UP too played dirty communal politics and failed to protect minorities in Muzaffarnagar and at many other places. Nor is it now, when Hindutva is politically dominant, that these parties have become anti-communal. However, due to their own interests such parties do remain politically opposed to BJP. The two alternate set of reasons from anti-Hindutva positions can be these. 1. Given that Hindutva is dominant, and poses immediate threat of whatever democracy exists, the more important thing is that its march be halted. Any battle, no matter how small, won against Hindutva punctures the arrogance of power which leaders like Modi display. 2. The alternate argument is that these parties have never been, nor can be consistently non-communal. Principled anti-Hindutva politics can not be expected from them. The second argument misses the fact that under given circumstances the electoral politics is not the primary arena of democratization of society. Defeat in elections weakens Hindutva dominance in state institutions, and affects it political legitimacy. It does not necessarily mean a decline in its social basis. Social struggles which challenge existing power structures directly:anti caste, feminist, working class movement, democratic rights movement,etc. counter the authoritarian core of Hindutva much more effectively than electoral politics, and these should remain primary areas of activity of progressives. This however, does not that mean that electoral politics has no place in anti-Hindutva mobilisations.

Another question relates to the role of religion in the public sphere. Hindutva has always tried to show the secularism in against Hindu interests. More worrying fact for progressives should be that despite a secular constitution, state institutions have been communal. Hardly anyone has been punished for gross violence during communal pogroms, or destruction of Babri mosque. An activist in Gujarat was reprimanded and fined by Gujarat High Court for bringing a PIL alleging that religious havan with Sanskrit shlokas and pandits during the inauguration of the new court building violated constitutional provisions of the constitution. Almost all police stations in northern India at least, have temples with Hindu deities. An important conceptual distinction exists between a communitarian defence of secularism (as best suited to protect minority interests) and a citizen centric defence which lays emphasis on the basic values of personal freedom and equality; even while in many practical contexts the two are similar in their demands. Progressives need to bring the later in public domain, because a sphere of increasing freedoms which enriching for every one can be brought about only on its basis.



(Based upon presentation and discussion during Workshop on Understanding and Resisting Fascism  - Indian Context organized by Jan Chinthana Kendra and Karnataka KomuSouhardaVedike in Benagluru, 27 Jan, 2018)